खाड़ी के ओमान तट के पास जब अमेरिकी नौसेना ने एक मालवाहक जहाज पर मिसाइल दागकर तीन बेकसूर भारतीय मल्लाहों को मौत के घाट उतार दिया, तो पूरे देश में गुस्सा फैल गया। लेकिन इस भीषण त्रासदी से ज्यादा चौंकाने वाली बात रही भारत सरकार की इस पर पहली प्रतिक्रिया। एक तरफ देश अपने बेटों के शवों का इंतजार कर रहा था, वहीं दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बनने की बधाई देने के लिए धन्यवाद कह रहे थे। इसी विरोधाभास ने भारतीय राजनीति में एक नया तूफान खड़ा कर दिया है।
आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने इसी मुद्दे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला है। केजरीवाल ने ट्रंप को सीधे तौर पर एक डरपोक और क्रूर हत्यारा करार दिया है। उन्होंने साफ कहा कि ट्रंप को इन मासूम भारतीयों की जान लेने की कीमत चुकानी होगी। राजनीति में कूटनीतिक बयानों की एक मर्यादा होती है, मगर केजरीवाल ने उस मर्यादा को किनारे रखकर सीधे देश की संप्रभुता और नागरिकों की सुरक्षा का सवाल उठाया है।
जब ओमान के तट पर लहूलुहान हुआ भारत का गौरव
यह पूरा मामला केवल राजनीतिक बयानबाजी का नहीं है। इसके पीछे एक दर्दनाक हकीकत है जिसे समझना जरूरी है। पलाऊ के झंडे वाले तेल टैंकर एमटी सेटेबेलो पर सवार भारतीय क्रू के सदस्य रोज की तरह अपना काम कर रहे थे। अमेरिकी सेना का दावा है कि इस जहाज ने ईरानी तेल शिपमेंट पर लगे प्रतिबंधों का उल्लंघन किया और अमेरिकी निर्देशों का पालन नहीं किया। इसके बाद अमेरिकी विमानों ने सीधे जहाज के इंजन रूम पर सटीक मिसाइल हमला कर दिया।
इस हमले में तीन भारतीय नागरिकों की मौके पर ही मौत हो गई। क्या किसी आर्थिक प्रतिबंध को लागू करने के लिए निर्दोष इंसानों की जान लेना जायज ठहराया जा सकता है? बिल्कुल नहीं। इस जहाज पर कुल 68 भारतीय नागरिक अलग-अलग दिनों में अमेरिकी हमलों के दायरे में आए। इस घटना ने साबित कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक लड़ाइयों में आम भारतीय नागरिकों को केवल एक मोहरा समझकर छोड़ दिया जाता है। मृतक चीफ इंजीनियर पटनाला सुरेश की पत्नी भार्गवी ने रोते हुए सरकार से पूछा है कि उनके पति की क्या गलती थी और सरकार इस पर चुप क्यों है?
मार्को रुबियो की धमकी और जयशंकर का विरोध
विपक्ष के गुस्से की एक बड़ी वजह अमेरिकी प्रशासन का अड़ियल रवैया भी है। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से फोन पर बात करके भारत का कड़ा विरोध दर्ज कराया था। जयशंकर ने स्पष्ट किया था कि कमर्शियल जहाजों पर इस तरह के घातक हमले किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं हैं।
मगर अमेरिका ने अपनी गलती मानने या खेद जताने के बजाय भारत को ही आंखें दिखाना शुरू कर दिया। अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस नेता मनीष तिवारी के मुताबिक, मार्को रुबियो का रुख बेहद आक्रामक और डराने वाला था। अमेरिका ने तीन भारतीयों की मौत पर दुख जताना तो दूर, उल्टा यह धमकी दे दी कि अगर अमेरिकी आदेशों का पालन नहीं किया गया, तो भारत को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। क्या दो देशों की दोस्ती ऐसी होती है? जब आपका तथाकथित मित्र देश आपके नागरिकों की हत्या कर दे और शिकायत करने पर आपको ही धमकाने लगे, तो उस दोस्ती की बुनियाद पर सवाल उठना लाजिमी है।
विपक्ष का सीधा आरोप और मोदी की कूटनीतिक मजबूरी
अरविंद केजरीवाल अकेले नहीं हैं जो इस मुद्दे पर सरकार को घेर रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी को देश की संप्रभुता के साथ समझौता बताया है। खड़गे ने कहा कि जब भारतीय नाविकों के शव तिरंगे में लिपटकर आ रहे थे, तब प्रधानमंत्री की ओर से एक शोक संदेश तक नहीं आया। विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार ने भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई है और देश के हितों को अमेरिका के सामने सरेंडर कर दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रूस या चीन के नागरिकों के साथ अगर ऐसा हुआ होता, तो वे अमेरिका को कड़ा सबक सिखाते। तो फिर भारत के प्रधानमंत्री के सामने ऐसी क्या मजबूरी है कि वे ट्रंप के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोल पा रहे? क्या विश्वगुरु का नैरेटिव केवल देश के अंदर चुनाव जीतने के लिए है? जब असल परीक्षा की घड़ी आती है, तो हमारी कूटनीति इतनी लाचार क्यों दिखाई देती है?
जी7 शिखर सम्मेलन और आगे का रास्ता
यह पूरा विवाद ऐसे समय में चल रहा है जब प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस में जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात करने वाले हैं। अरविंद केजरीवाल ने सीधे पीएम मोदी को चुनौती दी है कि अगर उनमें हिम्मत है, तो वे ट्रंप के सामने बैठकर इस हत्याकांड का विरोध दर्ज कराएं और अमेरिका से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने को कहें।
भारत सरकार ने दोनों देशों के बीच व्यापारिक और रक्षा समझौतों की दुहाई दी है। ट्रंप ने भी बयान दिया है कि भारत पर हमला होने पर अमेरिका मदद करेगा। लेकिन सवाल वही है कि जो देश आज हमारे नागरिकों की जान ले रहा है, वह भविष्य में हमारी सुरक्षा की गारंटी कैसे दे सकता है? भारत को अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता को वापस लाना होगा। देश के नागरिकों की जान किसी भी व्यापारिक समझौते या कूटनीतिक औपचारिकता से कहीं बढ़कर है। सरकार को तुरंत अमेरिका के सामने सख्त रुख अपनाते हुए पीड़ित परिवारों के लिए भारी मुआवजे और दोषियों को सजा दिलाने की मांग करनी चाहिए।