डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) के उत्तर-पूर्वी हिस्से में एक बार फिर खून बहा है। अलाइड डेमोक्रेटिक फोर्सेस यानी एडीएफ के आतंकियों ने कांगो के बेनी इलाके में जो तांडव मचाया है, उसने पूरी दुनिया को झकझोर दिया। इस हमले में 12 निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। ये कोई पहली बार नहीं है। और अगर हालात नहीं बदले, तो ये आखिरी बार भी नहीं होगा।
कांगो के इतुरी और उत्तरी किवु प्रांत सालों से इन आतंकियों का चारागाह बने हुए हैं। स्थानीय सूत्रों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने पुष्टि की है कि हमलावरों ने आधी रात को हमला किया। उन्होंने घरों में आग लगा दी और जो सामने आया उसे काट डाला। ये सीधे तौर पर इंसानियत की हार है।
एडीएफ आखिर इतना खतरनाक क्यों बना हुआ है
एडीएफ की जड़ें युगांडा में हैं, लेकिन इसने कांगो के जंगलों को अपना ठिकाना बना लिया है। 1990 के दशक से सक्रिय ये गुट अब आईएसआईएस (ISIS) के साथ जुड़ चुका है। यही जुड़ाव इसे और भी घातक बनाता है। इनके पास कोई नैतिकता नहीं है। ये सिर्फ दहशत फैलाना जानते हैं। कांगो की सेना और संयुक्त राष्ट्र के शांति रक्षक दल (MONUSCO) वहां मौजूद हैं, फिर भी ये आतंकी खुलेआम घूम रहे हैं।
सोचने वाली बात ये है कि सालों से जारी सैन्य ऑपरेशनों के बावजूद ये गुट खत्म क्यों नहीं हो रहा? दरअसल, कांगो का भूगोल इनके पक्ष में है। घने जंगल और पहाड़ियां इन्हें छिपने की जगह देती हैं। जब तक सेना एक इलाके को साफ करती है, ये दूसरे गांव में कत्लेआम मचा देते हैं। बेनी का इलाका रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है, और यही वजह है कि एडीएफ इसे बार-बार निशाना बनाता है।
स्थानीय लोगों का टूटता भरोसा
गांव वालों से बात करें तो उनका दर्द साफ़ झलकता है। उन्हें लगता है कि सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया है। 12 लोगों की हत्या सिर्फ एक संख्या नहीं है। ये 12 परिवार हैं जो पूरी तरह उजड़ गए। इनमें बच्चे और महिलाएं भी शामिल थीं। जब हमला शुरू हुआ, तो सुरक्षा बल समय पर नहीं पहुंच सके। ये विफलता बार-बार दोहराई जा रही है।
प्रशासन का कहना है कि वे आतंकियों का पीछा कर रहे हैं। पर सच तो ये है कि स्थानीय लोग अब इन वादों पर यकीन नहीं करते। उन्हें सुरक्षा चाहिए, प्रेस रिलीज नहीं। एडीएफ के आतंकी सिर्फ मारते नहीं हैं, वे अपहरण भी करते हैं। कई युवाओं को जबरन अपनी फौज में शामिल कर लेते हैं। ये एक ऐसा दुष्चक्र है जिसे तोड़ना फिलहाल नामुमकिन लग रहा है।
क्षेत्रीय राजनीति और संसाधनों की जंग
कांगो की इस हिंसा के पीछे सिर्फ कट्टरपंथ नहीं है। इसके पीछे छिपी है अरबों डॉलर की खनिज संपदा। कांगो की धरती के नीचे सोना, कोबाल्ट और कोल्टन दबा है। आतंकी गुट इन खदानों पर कब्जा करना चाहते हैं ताकि वे अपने हथियारों का खर्च निकाल सकें। कई बार ये भी आरोप लगते हैं कि पड़ोसी देशों के कुछ तत्व इन विद्रोहियों को शह देते हैं ताकि कांगो अस्थिर रहे।
बिना अंतरराष्ट्रीय दबाव और क्षेत्रीय सहयोग के एडीएफ को हराना मुश्किल है। युगांडा और कांगो की सेनाएं मिलकर ऑपरेशन 'शुजा' चला रही हैं। कुछ सफलताएं मिली भी हैं, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी डरावनी है। जब तक आतंकियों की सप्लाई लाइन और फंडिंग नहीं रोकी जाएगी, तब तक 12 मौतों का ये सिलसिला 1200 तक पहुंचने में देर नहीं लगाएगा।
शांति की कोशिशें और जमीनी हकीकत
संयुक्त राष्ट्र का शांति मिशन दुनिया के सबसे महंगे मिशनों में से एक है। इसके बावजूद, स्थानीय लोग इनके खिलाफ प्रदर्शन करते हैं। उनका गुस्सा जायज है। अगर अरबों रुपये खर्च करने के बाद भी एक किसान रात को चैन से नहीं सो सकता, तो उस सिस्टम का क्या फायदा? एडीएफ ने अपनी रणनीति बदल ली है। वे अब बड़े हमलों के बजाय छोटे समूहों में बंटकर छापामार युद्ध कर रहे हैं।
कांगो की सरकार को अपनी खुफिया जानकारी बेहतर करनी होगी। स्थानीय मुखबिरों का जाल बिछाना होगा जो आतंकियों की मूवमेंट की सटीक खबर दे सकें। सिर्फ बंदूकों से ये लड़ाई नहीं जीती जा सकती। आपको उन गांवों का विकास करना होगा जहां से आतंकी अपनी भर्ती करते हैं। गरीबी और लाचारी ही इन उग्रवादी गुटों की सबसे बड़ी ताकत है।
आगे का रास्ता और आपकी जिम्मेदारी
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कांगो की इस त्रासदी को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। मिडिल ईस्ट या यूक्रेन की खबरों के बीच अफ्रीका का ये कोना कहीं खो जाता है। पर याद रखिए, अस्थिरता कहीं भी हो, उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। अगर आईएसआईएस का पैर कांगो में जमता है, तो ये वैश्विक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा होगा।
हमें कांगो के लिए सिर्फ संवेदना नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की जरूरत है। मानवीय सहायता और सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना अब विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत है।
अगर आप इस क्षेत्र की सुरक्षा या मानवाधिकारों से जुड़े हैं, तो इन कदमों पर गौर करना जरूरी है:
- प्रभावित इलाकों में तत्काल चिकित्सा और खाद्य सहायता पहुंचाई जाए।
- स्थानीय रक्षा समितियों को प्रशिक्षित किया जाए ताकि वे सेना के आने तक खुद का बचाव कर सकें।
- खनिज व्यापार की निगरानी सख्त की जाए ताकि आतंकियों तक पैसा न पहुंचे।
कांगो की जनता और कितनी बलि देगी? ये सवाल आज हर उस शख्स से है जो शांति का हिमायती है। एडीएफ के इस आतंक को रोकना अब अनिवार्य हो गया है।